हिन्दू धर्म में नववधु के लिए कुछ श्रंगार अनिवार्य माना माने गए हैं।है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी इन सभी श्रंगारों को सुहागन के सुहाग का प्रतीक माना गया है। इसीलिए सभी नववधु के लिए ये सोलह श्रंगार बहुत जरूरी और एक तरह का शुभ शकुन माने गए हैं।
बिन्दी - सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिन्दुर से अपने ललाट पर लाल बिन्दी जरूर लगाती है और इसे परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
सिन्दुर - सिन्दुर को स्त्रियों का सुहाग चिन्ह माना जाता है। विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नि की मांग में सिंन्दुर भर कर जीवन भर उसका साथ निभाने का वचन देता है।
काजल - काजल आँखों का श्रृंगार है। इससे आँखों की सुन्दरता तो बढ़ती ही है, काजल दुल्हन को लोगों की बुरी नजर से भी बचाता है।
मेंहन्दी - मेहन्दी के बिना दुल्हन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। परिवार की सुहागिन स्त्रियां अपने हाथों और पैरों में मेहन्दी रचाती है। नववधू के हाथों में मेहन्दी जितनी गाढी़ रचती है, ऐसा माना जाता है कि उसका पति उतना ही ज्यादा प्यार करता है।
शादी का जोडा़ - शादी के समय दुल्हन को जरी के काम से सुसज्जित शादी का लाल जोड़ा पहनाया जाता है।
गजरा-दुल्हन के जूड़े में जब तक सुगंधित फूलों का गजरा न लगा हो तब तक उसका श्रृंगार कुछ फीका सा लगता है।
मांग टीका - मांग के बीचोंबीच पहना जाने वाला यह स्वर्ण आभूषण सिन्दुर के साथ मिलकर वधू की सुन्दरता में चार चाँद लगा देता है। राजस्थान में "बोरला" नामक आभूषण मांग टीका का ही एक रुप है। ऐसी मान्यता है कि इसे सिर के ठीक बीचोंबीच इसलिए पहना जाता है कि वधू शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय लें।
नथ - विवाह के अवसर पर पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेने के बाद में देवी पार्वती के सम्मान में नववधू को नथ पहनाई जाती है।
कर्ण फूल - कान में जाने वाला यह आभूषण कई तरह की सुन्दर आकृतियों में होता है, जिसे चेन के सहारे जुड़े में बांधा जाता है।
हार - गले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनबध्दता का प्रतीक माना जाता है। वधू के गले में वर व्दारा मंगलसूत्र (काले रंग की बारीक मोतियों का हार जो सोने की चेन में गुंथा होता है) पहनाने की रस्म की बड़ी अहमियत होती है। इसी से उसके विवाहित होने का संकेत मिलता है।
बाजूबन्द - कड़े के समान आकृति वाला यह आभूषण सोने या चान्दी का होता है। यह बांहो में पूरी तरह कसा रहता है, इसी कारण इसे बाजूबन्द कहा जाता है।
कंगण और चूडिय़ाँ - हिन्दू परिवारों में सदियों से यह परम्परा चली आ रही है कि सास अपनी बडी़ बहू को मुंह दिखाई रस्म में सुखी और सौभाग्यवती बने रहने के आशीर्वाद के साथ वही कंगण देती है, जो पहली बार ससुराल आने पर उसकी सास ने दिए थे। पारम्परिक रूप से ऐसा माना जाता है कि सुहागिन स्त्रियों की कलाइयां चूडिय़ों से भरी रहनी चाहिए।
अंगूठी - शादी के पहले सगाई की रस्म में वर-वधू द्वारा एक-दूसरे को अंगूठी पहनाने की परम्परा बहुत पूरानी है। अंगूठी को सदियों से पति-पत्नी के आपसी प्यार और विश्वास का प्रतीक माना जाता रहा है।
कमरबन्द - कमरबन्द कमर में पहना जाने वाला आभूषण है, जिसे स्त्रियां विवाह के बाद पहनती है। इससे उनकी छरहरी काया और भी आकर्षक दिखाई देती है। कमरबन्द इस बात का प्रतीक कि नववधू अब अपने नए घर की स्वामिनी है। कमरबन्द में प्राय: औरतें चाबियों का गुच्छा लटका कर रखती है।
बिछुआ - पैरें के अंगूठे में रिंग की तरह पहने जाने वाले इस आभूषण को अरसी या अंगूठा कहा जाता है। पारम्परिक रूप से पहने जाने वाले इस आभूषण के अलावा स्त्रियां कनिष्का को छोडकर तीनों अंगूलियों में बिछुआ पहनती है।
पायल- पैरों में पहने जाने वाले इस आभूषण के घुंघरूओं की सुमधुर ध्वनि से घर के हर सदस्य को नववधू की आहट का संकेत मिलता है।
Thursday, July 28, 2011
Wednesday, July 20, 2011
ग्रह को बलवान बनाने के कुछ उपाय
कई बार कुछ न कुछ नई परेशानी अवश्य ही उत्पन्न हो जाती है . बहुत से कार्य अटक जाते हैं। घर-परिवार में क्लेश, मानसिक तनाव रहता है। सामान्यत: इस प्रकार की सभी परेशानियों की वजह पैसा ही होता है। पर्याप्त धन नहीं है तो कई तरह की समस्याएं आपकों घेर लेंगी। इस प्रकार की परेशानियां विभिन्न ग्रहों की अलग-अलग अशुभ स्थिति के कारण उत्पन्न होती हैं। अपनी राशि से संबंधित ग्रह के शुभ प्रभाव के लिए एवं ग्रह को बलवान बनाने के लिए कुछ आसान उपाय अपना सकते है।
रत्न - राशि ग्रह के अशुभ प्रभाव को शुभ बनाने के लिए आप अपनी जन्म कुंडली के अनुसार उस ग्रह से संबंधित रत्न पहनें जो अशुभ प्रभाव दे रहा है। रत्न को ग्रह से संबंधित धातु में जड़वा कर अंगूठी, पेन्डेन्ट व ब्रेस्लेट में पहन सकते है। उस रत्न के माध्यम से किरणे शरीर में प्रवेश करके ग्रह को शक्ति प्रदान करती हैं।
जप- किसी भी ग्रह की दुर्बलता को दूर करने के लिए उस ग्रह से सम्बन्धित मन्त्र का जप निश्चित संख्या में करने से उस ग्रह को शक्ति प्राप्त होती है। जप करने से रत्न को भी सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
यज्ञ- वैदिक विधि के द्वारा ग्रह से सम्बन्धित मन्त्र का अनुष्ठान (हवन-यज्ञ) करने से अशुभ ग्रह भी बलवान होकर शुभ फल देने लग जाता है।
दान- ग्रह विशेष से संबंधित वस्तुओ को दान करने से अशुभ ग्रह के देवता प्रसन्न होकर अच्छा फल देते है।
यन्त्र- जन्मकुण्डली में जो ग्रह कमजोर होता है उससे संबंधित मन्त्र को विशेष मुहूर्त या उस ग्रह की होरा में भोजपत्र पर लिखें या किसी धातु (सोना, चाँदी, ताँबा) इत्यादि पर खुदवाकर सिद्ध कर लें. इस प्रकार सिद्ध किये हुए यन्त्र का नित्य प्रति पूजन करने से भी सम्बन्धित ग्रह में शक्ति का संचार होता है।
व्रत - जो ग्रह कमजोर होता है उससे संबंधित वार को व्रत रखने से व्यक्ति को उस ग्रह का शुभ फल प्राप्त होता है।
रत्न - राशि ग्रह के अशुभ प्रभाव को शुभ बनाने के लिए आप अपनी जन्म कुंडली के अनुसार उस ग्रह से संबंधित रत्न पहनें जो अशुभ प्रभाव दे रहा है। रत्न को ग्रह से संबंधित धातु में जड़वा कर अंगूठी, पेन्डेन्ट व ब्रेस्लेट में पहन सकते है। उस रत्न के माध्यम से किरणे शरीर में प्रवेश करके ग्रह को शक्ति प्रदान करती हैं।
जप- किसी भी ग्रह की दुर्बलता को दूर करने के लिए उस ग्रह से सम्बन्धित मन्त्र का जप निश्चित संख्या में करने से उस ग्रह को शक्ति प्राप्त होती है। जप करने से रत्न को भी सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
यज्ञ- वैदिक विधि के द्वारा ग्रह से सम्बन्धित मन्त्र का अनुष्ठान (हवन-यज्ञ) करने से अशुभ ग्रह भी बलवान होकर शुभ फल देने लग जाता है।
दान- ग्रह विशेष से संबंधित वस्तुओ को दान करने से अशुभ ग्रह के देवता प्रसन्न होकर अच्छा फल देते है।
यन्त्र- जन्मकुण्डली में जो ग्रह कमजोर होता है उससे संबंधित मन्त्र को विशेष मुहूर्त या उस ग्रह की होरा में भोजपत्र पर लिखें या किसी धातु (सोना, चाँदी, ताँबा) इत्यादि पर खुदवाकर सिद्ध कर लें. इस प्रकार सिद्ध किये हुए यन्त्र का नित्य प्रति पूजन करने से भी सम्बन्धित ग्रह में शक्ति का संचार होता है।
व्रत - जो ग्रह कमजोर होता है उससे संबंधित वार को व्रत रखने से व्यक्ति को उस ग्रह का शुभ फल प्राप्त होता है।
Thursday, July 7, 2011
मनचाही दुल्हन मिलेगी
- नवरात्रि में प्रतिदिन सुबह किसी शिव मंदिर में जाएं। वहां शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर चढ़ाते हुए उसे अच्छी तरह से साफ करें। फिर शुद्ध जल चढ़ाएं और पूरे मंदिर में झाड़ू लगाकर उसे साफ करें। अब भगवान शिव की चंदन, पुष्प एवं धूप, दीप आदि से पूजा-अर्चना करें। रात्रि 10 बजे के पश्चात अग्नि प्रज्वलित कर ऊँ नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए घी से 108 आहुति दें। अब 40 दिनों तक नित्य इसी मंत्र का पांच माला जप भगवान शिव के सम्मुख करें। इससे शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूर्ण होगी और अच्छे स्थान पर विवाह संबंध तय होगा। यदि विवाह में अड़चने अधिक आ रही हों तो मां जगदंबा का एक चित्र लाल कपड़े पर रखें और उसके सामने चावल से दो स्वस्तिक बनाएं। एक स्वस्तिक पर गणेशजी को विराजमान करें और दूसरे पर गौरी-शंकर रुद्राक्ष को स्थापित करें। यह रुद्राक्ष साक्षात मां पार्वती और भगवान शिव का प्रतीक है। अब इसके सम्मुख निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जाप करें और विवाह में आ रही बाधाओं के निवारण और शीघ्र विवाह की प्रार्थना भगवान से करें-
ऊँ कात्यायन्यै नम:अंत में इस रुद्राक्ष को मां गौरी और भगवान शिव का प्रसाद समझकर गले में धारण कर लें। शीघ्र ही आपका विवाह अच्छे स्थान पर तय हो जाएगा।
- गुप्त नवरात्रि में रोज नीचे लिखे मंत्र का जप तीन माला करें। जप से पूर्व मां दुर्गा की पंचोपचार पूजा करें और उन्हें लाल रंग का सुगंधित पुष्प अवश्य चढ़ाएं। इसके प्रभाव से शीघ्र ही आपका विवाह अच्छे स्थान पर तय हो जाएगा-
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीं तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।
नवरात्र के गुरुवार को पीले रंग का एक रुमाल मां दुर्गा को चढ़ाएं और पूजन के पश्चात यह रूमाल अपने साथ रखें। यह मां दुर्गा के प्रसादस्वरूप है। अब इसे आपको सदैव अपने साथ रखना है। शीघ्र आप देंखेंगे कि आपकी मनोकामना पूर्ण हो गई है।
ऊँ कात्यायन्यै नम:अंत में इस रुद्राक्ष को मां गौरी और भगवान शिव का प्रसाद समझकर गले में धारण कर लें। शीघ्र ही आपका विवाह अच्छे स्थान पर तय हो जाएगा।
- गुप्त नवरात्रि में रोज नीचे लिखे मंत्र का जप तीन माला करें। जप से पूर्व मां दुर्गा की पंचोपचार पूजा करें और उन्हें लाल रंग का सुगंधित पुष्प अवश्य चढ़ाएं। इसके प्रभाव से शीघ्र ही आपका विवाह अच्छे स्थान पर तय हो जाएगा-
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीं तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम्।।
नवरात्र के गुरुवार को पीले रंग का एक रुमाल मां दुर्गा को चढ़ाएं और पूजन के पश्चात यह रूमाल अपने साथ रखें। यह मां दुर्गा के प्रसादस्वरूप है। अब इसे आपको सदैव अपने साथ रखना है। शीघ्र आप देंखेंगे कि आपकी मनोकामना पूर्ण हो गई है।
Wednesday, June 29, 2011
एक वर्ष में चार नवरात्रि
हिंदू धर्म के अनुसार एक वर्ष में चार नवरात्रि होती है। वर्ष के प्रथम मास अर्थात चैत्र में प्रथम नवरात्रि होती है। चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्रि होती है। इसके बाद अश्विन मास में प्रमुख नवरात्रि होती है। इसी प्रकार वर्ष के ग्यारहवें महीने अर्थात माघ में भी गुप्त नवरात्रि मनाने का उल्लेख एवं विधान देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।इनमें अश्विन मास की नवरात्रि सबसे प्रमुख मानी जाती है। इस दौरान पूरे देश में गरबों के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। दूसरी प्रमुख नवरात्रि चैत्र मास की होती है। इन दोनों नवरात्रियों को क्रमश: शारदीय व वासंती नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि गुप्त रहती है। इसके बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं होती, इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं।
Sunday, June 26, 2011
शिव की साकार और निराकार भक्ति
शिव की भक्ति और पूजा साकार और निराकार दोनों रूप में होती है। शिव मूर्त या सगुण और अमूर्त या निर्गुण रूप में पूजे जाते हैं। शिव ऐसे स्वरूप, अलग-अलग गुण और शक्तियों के कारण अनेक नामों से प्रसिद्ध हैं। शिव का साकार रूप सदाशिव नाम से प्रसिद्ध है। इसी तरह शिव की पंचमूर्तियां - ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात से पूजनीय है, जो खासतौर पर पंचवक्त्र पूजा में पंचानन रूप का पूजन किया जाता है। भगवान शिव की अष्टमूर्ति पूजा का भी महत्व बताया गया है। यह अष्टमूर्ति है - शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव जो क्रम से पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु, आकाश, क्षेत्रज्ञ, सूर्य और चन्द्र रूप में स्थित मूर्ति मानी गई है। साम्ब-सदाशिव, अर्द्धनारीश्वर, महामृत्युञ्जय, पशुपति, उमा-महेश्वर, पञ्चवक्त्र, कृत्तिवासा, दक्षिणामूर्ति, योगीश्वर और महेश्वर नाम से भी शिव के अद्भुत और शक्ति संपन्न स्वरूप पूजनीय है। रुद्र भगवान शिव का परब्रह्म स्वरूप है, जो सृष्टि रचना, पालन और संहार शक्ति के नियंत्रक माने गए हैं। रुद्र शक्ति के साथ शिव घोरा के नाम से भी प्रसिद्ध है। रुद्र रूप माया से परे ईश्वर का वास्तविक स्वरूप और शक्ति मानी गई है।
शैव ग्रंथों में शिव चरित्र और स्वभाव कल्याणकारी, समर्थ, पालक, उद्धारक, सर्वश्रेष्ठ, अविनाशी बताया गया है। यही कारण है कि शिव की उपासना सभी सांसारिक जीवों के लिये सुखद फल देने वाली मानी गई है। शास्त्रों में शिव की प्रसन्नता के लिये विशेष मंत्र बहुत प्रभावी माने गए हैं। इन मंत्रों में शिव पंचाक्षरी मंत्र सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। पांच अक्षरों का यह मंत्र छोटा जरूर है, लेकिन माना गया है कि इसमें वेद का सार समाया है। यह शिव द्वारा सिद्ध मंत्र माना गया है। जिसके जप से हर सुख और प्रसन्नता प्राप्त होती है। यही कारण है कि शिव उपासना के विशेष दिन सोमवार को पंचाक्षरी मंत्र के जप का महत्व सभी इच्छाओं की सिद्धी के लिये बहुत ही शुभ माना गया है।
सोमवार को यथासंभव व्रत रखकर रात्रि में भोजन करें। प्रात: स्नान कर शिवालय में शिव को गंगाजल या गाय के दूध से स्नान कराएं। शिव की पूजा में गंध, अक्षत, फूल, बिल्वपत्र चढ़ाकर नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के बाद नीचे लिखे छोटे और बेहद आसान पंचाक्षरी मंत्र का जप करें-
नम: शिवाय
पूजा , मंत्र जप के बाद शिव आरती कर मनोकामना पूर्ति के लिये शिव के सामने मन ही मन प्रार्थना करें।
शैव ग्रंथों में शिव चरित्र और स्वभाव कल्याणकारी, समर्थ, पालक, उद्धारक, सर्वश्रेष्ठ, अविनाशी बताया गया है। यही कारण है कि शिव की उपासना सभी सांसारिक जीवों के लिये सुखद फल देने वाली मानी गई है। शास्त्रों में शिव की प्रसन्नता के लिये विशेष मंत्र बहुत प्रभावी माने गए हैं। इन मंत्रों में शिव पंचाक्षरी मंत्र सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। पांच अक्षरों का यह मंत्र छोटा जरूर है, लेकिन माना गया है कि इसमें वेद का सार समाया है। यह शिव द्वारा सिद्ध मंत्र माना गया है। जिसके जप से हर सुख और प्रसन्नता प्राप्त होती है। यही कारण है कि शिव उपासना के विशेष दिन सोमवार को पंचाक्षरी मंत्र के जप का महत्व सभी इच्छाओं की सिद्धी के लिये बहुत ही शुभ माना गया है।
सोमवार को यथासंभव व्रत रखकर रात्रि में भोजन करें। प्रात: स्नान कर शिवालय में शिव को गंगाजल या गाय के दूध से स्नान कराएं। शिव की पूजा में गंध, अक्षत, फूल, बिल्वपत्र चढ़ाकर नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के बाद नीचे लिखे छोटे और बेहद आसान पंचाक्षरी मंत्र का जप करें-
नम: शिवाय
पूजा , मंत्र जप के बाद शिव आरती कर मनोकामना पूर्ति के लिये शिव के सामने मन ही मन प्रार्थना करें।
Saturday, June 18, 2011
शनैश्चर स्तवराज
शनि के कोप से बचने के लिये ही शास्त्रों में दोपहर में शनि पूजा कर शनैश्चर स्तवराज का पाठ बहुत असरदार माना गया है। विशेष तौर पर शनि दशा में यह शनि को अनुकूल बनाता है। अगर आप शनि दशा से गुजर रहे हैं या शनि दशा लगने वाली हो तो नीचे लिखी सरल विधि से शनि पूजा और मंत्र स्तुति करें - शनिवार के दिन दोपहर में शनि मंदिर में शनि प्रतिमा को गंध, तिल का तेल, काले तिल, उड़द, काला कपड़ा व तेल से बने व्यजंन चढ़ाकर नीचे लिखे शनैश्चर स्तवराज का पाठ करें -
ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजो युधिष्ठिरः।
धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम।।
शिरो में भास्करिः पातु भालं छायासुतोवतु।
कोटराक्षो दृशौ पातु शिखिकण्ठनिभः श्रुती ।।
घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोवतु।
स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोवतु ।।
सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोवतु ।
ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः ।।
पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः ।
रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम।।
सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः ।
सौरिः शनैश्चरः कृष्णो नीलोत्पलनिभः शन।।
शुष्कोदरो विशालाक्षो र्दुनिरीक्ष्यो विभीषणः ।
शिखिकण्ठनिभो नीलश्छायाहृदयनन्दनः ।।
कालदृष्टिः कोटराक्षः स्थूलरोमावलीमुखः ।
दीर्घो निर्मांसगात्रस्तु शुष्को घोरो भयानकः ।।
नीलांशुः क्रोधनो रौद्रो दीर्घश्मश्रुर्जटाधरः।
मन्दो मन्दगतिः खंजो तृप्तः संवर्तको यमः ।।
ग्रहराजः कराली च सूर्यपुत्रो रविः शशी ।
कुजो बुधो गुरूः काव्यो भानुजः सिंहिकासुत।।
केतुर्देवपतिर्बाहुः कृतान्तो नैऋतस्तथा।
शशी मरूत्कुबेरश्च ईशानः सुर आत्मभूः ।।
विष्णुर्हरो गणपतिः कुमारः काम ईश्वरः।
कर्ता हर्ता पालयिता राज्यभुग् राज्यदायकः ।।
छायासुतः श्यामलाङ्गो धनहर्ता धनप्रदः।
क्रूरकर्मविधाता च सर्वकर्मावरोधकः ।।
तुष्टो रूष्टः कामरूपः कामदो रविनन्दनः ।
ग्रहपीडाहरः शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वरः ।।
स्थिरासनः स्थिरगतिर्महाकायो महाबलः ।
महाप्रभो महाकालः कालात्मा कालकालकः ।।
आदित्यभयदाता च मृत्युरादित्यनंदनः।
शतभिद्रुक्षदयिता त्रयोदशितिथिप्रियः ।।
तिथ्यात्मा तिथिगणनो नक्षत्रगणनायकः ।
योगराशिर्मुहूर्तात्मा कर्ता दिनपतिः प्रभुः ।।
शमीपुष्पप्रियः श्यामस्त्रैलोक्याभयदायकः ।
नीलवासाः क्रियासिन्धुर्नीलाञ्जनचयच्छविः ।।
सर्वरोगहरो देवः सिद्धो देवगणस्तुतः।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां सौरेश्छायासुतस्य यः ।।
पठेन्नित्यं तस्य पीडा समस्ता नश्यति ध्रुवम् ।
कृत्वा पूजां पठेन्मर्त्यो भक्तिमान्यः स्तवं सदा ।।
विशेषतः शनिदिने पीडा तस्य विनश्यति।
जन्मलग्ने स्थितिर्वापि गोचरे क्रूरराशिगे ।।
दशासु च गते सौरे तदा स्तवमिमं पठेत् ।
पूजयेद्यः शनिं भक्त्या शमीपुष्पाक्षताम्बरैः ।।
विधाय लोहप्रतिमां नरो दुःखाद्विमुच्यते ।
वाधा यान्यग्रहाणां च यः पठेत्तस्य नश्यति ।।
भीतो भयाद्विमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
रोगी रोगाद्विमुच्येत नरः स्तवमिमं पठेत् ।।
पुत्रवान्धनवान् श्रीमान् जायते नात्र संशयः ।।
स्तवं निशम्य पार्थस्य प्रत्यक्षोभूच्छनैश्चरः ।
दत्त्वा राज्ञे वरः कामं शनिश्चान्तर्दधे तदा ।।
ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजो युधिष्ठिरः।
धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम।।
शिरो में भास्करिः पातु भालं छायासुतोवतु।
कोटराक्षो दृशौ पातु शिखिकण्ठनिभः श्रुती ।।
घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोवतु।
स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोवतु ।।
सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोवतु ।
ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः ।।
पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः ।
रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम।।
सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः ।
सौरिः शनैश्चरः कृष्णो नीलोत्पलनिभः शन।।
शुष्कोदरो विशालाक्षो र्दुनिरीक्ष्यो विभीषणः ।
शिखिकण्ठनिभो नीलश्छायाहृदयनन्दनः ।।
कालदृष्टिः कोटराक्षः स्थूलरोमावलीमुखः ।
दीर्घो निर्मांसगात्रस्तु शुष्को घोरो भयानकः ।।
नीलांशुः क्रोधनो रौद्रो दीर्घश्मश्रुर्जटाधरः।
मन्दो मन्दगतिः खंजो तृप्तः संवर्तको यमः ।।
ग्रहराजः कराली च सूर्यपुत्रो रविः शशी ।
कुजो बुधो गुरूः काव्यो भानुजः सिंहिकासुत।।
केतुर्देवपतिर्बाहुः कृतान्तो नैऋतस्तथा।
शशी मरूत्कुबेरश्च ईशानः सुर आत्मभूः ।।
विष्णुर्हरो गणपतिः कुमारः काम ईश्वरः।
कर्ता हर्ता पालयिता राज्यभुग् राज्यदायकः ।।
छायासुतः श्यामलाङ्गो धनहर्ता धनप्रदः।
क्रूरकर्मविधाता च सर्वकर्मावरोधकः ।।
तुष्टो रूष्टः कामरूपः कामदो रविनन्दनः ।
ग्रहपीडाहरः शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वरः ।।
स्थिरासनः स्थिरगतिर्महाकायो महाबलः ।
महाप्रभो महाकालः कालात्मा कालकालकः ।।
आदित्यभयदाता च मृत्युरादित्यनंदनः।
शतभिद्रुक्षदयिता त्रयोदशितिथिप्रियः ।।
तिथ्यात्मा तिथिगणनो नक्षत्रगणनायकः ।
योगराशिर्मुहूर्तात्मा कर्ता दिनपतिः प्रभुः ।।
शमीपुष्पप्रियः श्यामस्त्रैलोक्याभयदायकः ।
नीलवासाः क्रियासिन्धुर्नीलाञ्जनचयच्छविः ।।
सर्वरोगहरो देवः सिद्धो देवगणस्तुतः।
अष्टोत्तरशतं नाम्नां सौरेश्छायासुतस्य यः ।।
पठेन्नित्यं तस्य पीडा समस्ता नश्यति ध्रुवम् ।
कृत्वा पूजां पठेन्मर्त्यो भक्तिमान्यः स्तवं सदा ।।
विशेषतः शनिदिने पीडा तस्य विनश्यति।
जन्मलग्ने स्थितिर्वापि गोचरे क्रूरराशिगे ।।
दशासु च गते सौरे तदा स्तवमिमं पठेत् ।
पूजयेद्यः शनिं भक्त्या शमीपुष्पाक्षताम्बरैः ।।
विधाय लोहप्रतिमां नरो दुःखाद्विमुच्यते ।
वाधा यान्यग्रहाणां च यः पठेत्तस्य नश्यति ।।
भीतो भयाद्विमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
रोगी रोगाद्विमुच्येत नरः स्तवमिमं पठेत् ।।
पुत्रवान्धनवान् श्रीमान् जायते नात्र संशयः ।।
स्तवं निशम्य पार्थस्य प्रत्यक्षोभूच्छनैश्चरः ।
दत्त्वा राज्ञे वरः कामं शनिश्चान्तर्दधे तदा ।।
Wednesday, June 1, 2011
बहुत ही पुण्य और संकटनाशक योग
बुधवार बुध ग्रह दोष शांति और श्री गणेश उपासना से विघ्रनाश और बुद्धि, समृद्धि पाने का बहुत ही शुभ दिन माना जाता है। बुध को शनि का मित्र ग्रह भी माना गया है।
शनि जयंती के साथ बुधवार बहुत ही पुण्य और संकटनाशक योग है। पुराणों के मुताबिक भगवान गणेश के जन्म के बाद जब शनिदेव की शापित नजर से श्री गणेश का सिर धड़ से अलग हो गया और वह गजमुख बने, तब माता पार्वती द्वारा दिये गए अंगरहित हो जाने के शाप से रक्षा के लिए शनिदेव ने भी गणेश की उपासना की।
शनि दोष से बचने के लिए भी भगवान श्री गणेश की स्तुति बहुत ही प्रभावी मानी गई है। खासतौर पर बुधवार और शनि जयंती की घड़ी में गणेश गायत्री के अलग-अलग मंत्रों और शनि का ध्यान शनि पीड़ा से रक्षा करेगा - सुबह और शाम दोनों वक्त स्नान कर नवग्रह मंदिर में या घर के देवालय में भगवान गणेश और शनि की पूजा करें। शनि प्रतिमा को तिल का तेल चढ़ाएं और शनि का नीचे लिखे मंत्र से ध्यान करें, गंध, अक्षत, फूल अर्पित करें। तिल के पकवान चढ़ावें।
नीलांबुज समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छाया मार्तण्ड सम्भूतं शनिमावाह्याम्यहम्।।
भगवान गणेश की प्रतिमा की भी लाल चंदन, अक्षत, दूर्वा, फूल, सिंदूर, मोदक का भोग चढ़ाकर पूजा करें। पूजा के बाद नीचे लिखें गणेश गायत्री मंत्रों में सभी या एक का जप कर शनि पीड़ा के साथ जीवन में विघ्रों से रक्षा की कामना करें -
- ॐ तत्कराटाय विद्महे। हस्तिमुखाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
- ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
- ॐ लम्बोदराय विद्महे। महोदराय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
- ॐ महोल्काय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
अंत में शनि और गणेश की आरती करें।
शनि जयंती के साथ बुधवार बहुत ही पुण्य और संकटनाशक योग है। पुराणों के मुताबिक भगवान गणेश के जन्म के बाद जब शनिदेव की शापित नजर से श्री गणेश का सिर धड़ से अलग हो गया और वह गजमुख बने, तब माता पार्वती द्वारा दिये गए अंगरहित हो जाने के शाप से रक्षा के लिए शनिदेव ने भी गणेश की उपासना की।
शनि दोष से बचने के लिए भी भगवान श्री गणेश की स्तुति बहुत ही प्रभावी मानी गई है। खासतौर पर बुधवार और शनि जयंती की घड़ी में गणेश गायत्री के अलग-अलग मंत्रों और शनि का ध्यान शनि पीड़ा से रक्षा करेगा - सुबह और शाम दोनों वक्त स्नान कर नवग्रह मंदिर में या घर के देवालय में भगवान गणेश और शनि की पूजा करें। शनि प्रतिमा को तिल का तेल चढ़ाएं और शनि का नीचे लिखे मंत्र से ध्यान करें, गंध, अक्षत, फूल अर्पित करें। तिल के पकवान चढ़ावें।
नीलांबुज समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छाया मार्तण्ड सम्भूतं शनिमावाह्याम्यहम्।।
भगवान गणेश की प्रतिमा की भी लाल चंदन, अक्षत, दूर्वा, फूल, सिंदूर, मोदक का भोग चढ़ाकर पूजा करें। पूजा के बाद नीचे लिखें गणेश गायत्री मंत्रों में सभी या एक का जप कर शनि पीड़ा के साथ जीवन में विघ्रों से रक्षा की कामना करें -
- ॐ तत्कराटाय विद्महे। हस्तिमुखाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
- ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
- ॐ लम्बोदराय विद्महे। महोदराय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
- ॐ महोल्काय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।।
अंत में शनि और गणेश की आरती करें।
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