Tuesday, February 14, 2012

शिव पंचाक्षर स्त्रोत

Shiv Panchakshar Strot (हर मनोकामना पूरी करता है) नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मे न काराय नम: शिवाय:॥ मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मे म काराय नम: शिवाय:॥ शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय श्री नीलकंठाय वृषभद्धजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय:॥ वषिष्ठ कुभोदव गौतमाय मुनींद्र देवार्चित शेखराय चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै व काराय नम: शिवाय:॥ यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकस्ताय सनातनाय दिव्याय देवाय दिगंबराय तस्मै य काराय नम: शिवाय:॥ पंचाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेत शिव सन्निधौ शिवलोकं वाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

Tuesday, October 25, 2011

मां लक्ष्मी की चौकी

पूजा के लिए मां लक्ष्मी किस प्रकार स्थापित करना है? मां लक्ष्मी की चौकी विधि-विधान से सजाई जानी चाहिए।
चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियां इस प्रकार रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहे। लक्ष्मीजी, गणेशजी के दाहिनी ओर स्थापित करें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावल पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटे कि नारियल का आगे का भाग दिखाई दे और इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुणदेव का प्रतीक है। अब दो बड़े दीपक रखें। एक घी व दूसरे में तेल का दीपक लगाएं। एक दीपक चौकी के दाहिनी ओर रखें एवं दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अतिरिक्त एक दीपक गणेशजी के पास रखें.लक्ष्मी पूजन के समय एक चौकी पर मां लक्ष्मी और श्रीगणेश आदि प्रतिमाएं स्थापित की जाती है। इसकी जानकारी पूर्व में प्रकाशित की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त एक छोटी चौकी भी बनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस चौकी को विधि-विधान से सजाना चाहिए। इस छोटी चौकी को इस प्रकार सजाएं-
मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। फिर कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां तीन लाइनों में बनाएं। इसे आप चित्र में (1) चिन्ह से देख सकते हैं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। यह सोलह ढेरियां मातृका (2) की प्रतीक है। जैसा कि चित्र में चिन्ह (2) पर दिखाया गया है। नवग्रह व सोलह मातृका के बीच में स्वस्तिक (3) का चिन्ह बनाएं। इसके बीच में सुपारी (4) रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी रखें। लक्ष्मीजी की ओर श्री का चिन्ह (5) बनाएं। गणेशजी की ओर त्रिशूल (6) बनाएं। एक चावल की ढेरी (7) लगाएं जो कि ब्रह्माजी की प्रतीक है। सबसे नीचे चावल की नौ ढेरियां बनाएं (8) जो मातृक की प्रतीक है। सबसे ऊपर ऊँ (9) का चिन्ह बनाएं। इन सबके अतिरिक्त कलम, दवात, बहीखाते एवं सिक्कों की थैली भी रखें।
इस प्रकार मां लक्ष्मी की चौकी सजाने पर भक्त को साल भर पैसों की कोई कमी नहीं रहती है।

Friday, October 21, 2011

6 बुरी आदतों से किनारा करना चाहिए

महाभारत धन संपन्नता या लक्ष्मी का साया सिर पर बनाए रखने की ऐसी ही चाहत पूरी करने के लिए व्यावहारिक जीवन में कर्म व स्वभाव में कुछ गलत आदतों को पूरी तरह से दूर रहने की ओर साफ इशारा करता है। जिसके रहते लक्ष्मी की प्रसन्नता कठिन मानी गई है।
वैभवशाली, प्रतिष्ठित व सफल जीवन के लिए बेताब इंसान को बुरी आदतों से किनारा करना चाहिए - महाभारत में लिखा है कि -

षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।।


इस श्लोक मे कर्म, स्वभाव व व्यवहार से जुड़ी इन छ: आदतों से यथासंभव मुक्त रहने की सीख है -
नींद - अधिक सोना समय को खोना माना जाता है, साथ ही यह दरिद्रता का कारण बनता है, इसलिए नींद भी संयमित, नियमित और वक्त के मुताबिक हो। यानी वक्त और कर्म को महत्व देने वाला धन पाने का पात्र बनता है।
तन्द्रा - तन्द्रा यानि ऊँघना निष्क्रियता की पहचान है। यह कर्म और कामयाबी में सबसे बड़ी बाधा है। कर्महीनता से लक्ष्मी तक पहुंच संभव नहीं।
डर - भय व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करता है। जिसके बिना सफलता संभव नहीं। निर्भय व पावन चरित्र लक्ष्मी की प्रसन्नता का एक कारण है।
क्रोध
- क्रोध व्यक्ति के स्वभाव, गुणों और चरित्र पर बुरा असर डालता है। यह दोष सभी पापों का मूल है, जिससे लक्ष्मी दूर रहती है।
आलस्य
- आलस्य मकसद को पूरा करने में सबसे बड़ी बाधा है। संकल्पों को पूरा करने के लिए जरूरी है आलस्य को दूर ही रखें। यह अलक्ष्मी का रूप है।
दीर्घसूत्रता - जल्दी हो जाने वाले काम में अधिक देर करना, टालमटोल या विलंब करना।

वैभव लक्ष्मी की उपासना

देवी उपासना के किसी भी विशेष दिन जैसे, शुक्रवार, नवमी, नवरात्रि या दीपावली यानी, अमावस्या की रात्रि पर विशेष मंत्र से लक्ष्मी का ध्यान मनचाहे आनंद व समृद्धि देती है। वैभव लक्ष्मी की उपासना की आसान विधि और मंत्र विशेष - शुक्रवार को पूरे दिन व्रत रख शाम को स्नान के बाद माता लक्ष्मी की पूजा करें। वैभव लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र की पूजा में खासतौर पर लाल चंदन, गंध, लाल वस्त्र, लाल फूल अर्पित करें। खीर का भोग लगाएं। पूजा के बाद समृद्धि व शांति की इच्छा से इस वैभव लक्ष्मी मंत्र का यथाशक्ति जप करें -

या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी।

या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥

या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।

सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥


इस मंत्र जप के बाद वैभव लक्ष्मी व्रत कथा पढ़े या सुने। गोघृत दीप आरती करें। माता लक्ष्मी से क्षमा प्रार्थना करें व हर अभाव का दूर करने की कामना करें। प्रसाद ग्रहण कर घर के द्वार पर एक दीप लगाएं।

Sunday, September 25, 2011

शिव षडक्षर स्त्रोत

शिव उपासना की मंगलकारी घड़ी प्रदोष काल में कल्याणकारी देवता शिव के अद्भुत षड़ाक्षरी मंत्र स्तुति का स्मरण तमाम सफलता व सुख पाने के लिए असरदार माना गया है। जिसे शिव की पंचोपचार पूजा कर बोलना भी शुभ फलदायी माना गया है। शाम को शिव की पंचोपचार पूजा दूध, गंध, अक्षत, धतुरा, बिल्वपत्र व नैवेद्य अर्पित कर करें। धूप व दीप लगाकर नीचे लिखे षडाक्षरी मंत्र यानी ऊँ नम: शिवाय मंत्र की भी महिमा प्रकट करने वाले अद्भुत स्त्रोत का ध्यान कर शिव की आरती करें। यह शिव षडक्षर स्त्रोत के नाम से भी प्रसिद्ध है।

ऊँकार बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिन:।
कामदं मोक्षदं चैव ऊँकाराय नमो नम:।।

नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणा:।
नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नम:।।

महादेव महात्मानं महाध्यानं परायणम्।
महापापहरं देव मकाराय नमो नम:।।

शिवं शातं जगन्ननाथं लोकानुग्रहकारकम्।
शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नम:।।

वाहनं वृषभो यस्य वासुकि: कंठभूषणम्।
वामे शक्तिधरं वेदं वकाराय नमो नम:।।

यत्र तत्र स्थितो देव: सर्वव्यापी महेश्वर:।
यो गुरु : सर्वदेवानां यकाराय नमो नम:।।

षडक्षरमिदं स्तोत्रं य: पठेच्छिवसंनिधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।

Saturday, August 13, 2011

सूर्य उपासना शुभ फलदायी

भगवान सूर्य ही इस जगत के स्वामी है। सूर्य की शक्ति, गति और ऊर्जा ही जगत के लिये प्राणदायी है।ज्ञान व कर्म से सबल बन, समय की चाल को समझ और सकारात्मक सोच से ऊर्जावान बने रहकर ही सफलता, प्रतिष्ठा और यश से जीवन रोशन हो सकता है। रविवार को सूर्य उपासना बहुत ही शुभ फलदायी मानी गई है। सूर्य उपासना में विशेष मंत्र कामनासिद्धि में बहुत असरदार माने गए हैं। रविवार सूर्योदय से पहले स्नान करें, सूर्य उदय होने पर नीचे लिखे मंत्र से जल भरे तांबे के कलश से सूर्य अर्घ्य दें -
प्रभाकराय मित्राय नमस्तेदितिसम्भव।
नमो गोपतये नित्यं दिशां च पतये नम:।।

सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य की प्रतिमा को लाल चंदन, लाल कमल अर्पित कर गेहूं के आटे और घी व शक्कर से बने कसार का भोग लगाएं। इसके बाद नीचे लिखी सूर्य प्रार्थना बोलें -
यमाराध्य पुरा देवी सावित्री काममाप वै।
स मे ददातु देवेश: सर्वान् कामान् विभावसु:।।
यमाराध्यादिति: प्राप्ता सर्वान् कामान् यथेप्सितान्।
स ददात्वखिलान् कामान् प्रसन्नो मे दिवस्पति:।
भ्रष्टराज्यश्च देवेन्द्रो यमभ्यर्च्य दिवस्पति:।
कामान् सम्प्राप्तवान् राज्यं स मे कामं प्रयच्छतु।।

प्रार्थना पूजा के बाद गुग्गल धूप व दीप आरती कर निरोगी, सुखी व सफल जीवन की कामना सूर्य देव से करें।

Thursday, July 28, 2011

श्रंगार सुहागन के सुहाग के प्रतीक

हिन्दू धर्म में नववधु के लिए कुछ श्रंगार अनिवार्य माना माने गए हैं।है। हमारे धर्मशास्त्रों में भी इन सभी श्रंगारों को सुहागन के सुहाग का प्रतीक माना गया है। इसीलिए सभी नववधु के लिए ये सोलह श्रंगार बहुत जरूरी और एक तरह का शुभ शकुन माने गए हैं।
बिन्दी - सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिन्दुर से अपने ललाट पर लाल बिन्दी जरूर लगाती है और इसे परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
सिन्दुर - सिन्दुर को स्त्रियों का सुहाग चिन्ह माना जाता है। विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नि की मांग में सिंन्दुर भर कर जीवन भर उसका साथ निभाने का वचन देता है।
काजल - काजल आँखों का श्रृंगार है। इससे आँखों की सुन्दरता तो बढ़ती ही है, काजल दुल्हन को लोगों की बुरी नजर से भी बचाता है।
मेंहन्दी - मेहन्दी के बिना दुल्हन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। परिवार की सुहागिन स्त्रियां अपने हाथों और पैरों में मेहन्दी रचाती है। नववधू के हाथों में मेहन्दी जितनी गाढी़ रचती है, ऐसा माना जाता है कि उसका पति उतना ही ज्यादा प्यार करता है।
शादी का जोडा़ - शादी के समय दुल्हन को जरी के काम से सुसज्जित शादी का लाल जोड़ा पहनाया जाता है।
गजरा-दुल्हन के जूड़े में जब तक सुगंधित फूलों का गजरा न लगा हो तब तक उसका श्रृंगार कुछ फीका सा लगता है।
मांग टीका - मांग के बीचोंबीच पहना जाने वाला यह स्वर्ण आभूषण सिन्दुर के साथ मिलकर वधू की सुन्दरता में चार चाँद लगा देता है। राजस्थान में "बोरला" नामक आभूषण मांग टीका का ही एक रुप है। ऐसी मान्यता है कि इसे सिर के ठीक बीचोंबीच इसलिए पहना जाता है कि वधू शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय लें।
नथ - विवाह के अवसर पर पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेने के बाद में देवी पार्वती के सम्मान में नववधू को नथ पहनाई जाती है।
कर्ण फूल - कान में जाने वाला यह आभूषण कई तरह की सुन्दर आकृतियों में होता है, जिसे चेन के सहारे जुड़े में बांधा जाता है।
हार - गले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनबध्दता का प्रतीक माना जाता है। वधू के गले में वर व्दारा मंगलसूत्र (काले रंग की बारीक मोतियों का हार जो सोने की चेन में गुंथा होता है) पहनाने की रस्म की बड़ी अहमियत होती है। इसी से उसके विवाहित होने का संकेत मिलता है।
बाजूबन्द - कड़े के समान आकृति वाला यह आभूषण सोने या चान्दी का होता है। यह बांहो में पूरी तरह कसा रहता है, इसी कारण इसे बाजूबन्द कहा जाता है।
कंगण और चूडिय़ाँ - हिन्दू परिवारों में सदियों से यह परम्परा चली आ रही है कि सास अपनी बडी़ बहू को मुंह दिखाई रस्म में सुखी और सौभाग्यवती बने रहने के आशीर्वाद के साथ वही कंगण देती है, जो पहली बार ससुराल आने पर उसकी सास ने दिए थे। पारम्परिक रूप से ऐसा माना जाता है कि सुहागिन स्त्रियों की कलाइयां चूडिय़ों से भरी रहनी चाहिए।
अंगूठी - शादी के पहले सगाई की रस्म में वर-वधू द्वारा एक-दूसरे को अंगूठी पहनाने की परम्परा बहुत पूरानी है। अंगूठी को सदियों से पति-पत्नी के आपसी प्यार और विश्वास का प्रतीक माना जाता रहा है।
कमरबन्द - कमरबन्द कमर में पहना जाने वाला आभूषण है, जिसे स्त्रियां विवाह के बाद पहनती है। इससे उनकी छरहरी काया और भी आकर्षक दिखाई देती है। कमरबन्द इस बात का प्रतीक कि नववधू अब अपने नए घर की स्वामिनी है। कमरबन्द में प्राय: औरतें चाबियों का गुच्छा लटका कर रखती है।
बिछुआ - पैरें के अंगूठे में रिंग की तरह पहने जाने वाले इस आभूषण को अरसी या अंगूठा कहा जाता है। पारम्परिक रूप से पहने जाने वाले इस आभूषण के अलावा स्त्रियां कनिष्का को छोडकर तीनों अंगूलियों में बिछुआ पहनती है।
पायल- पैरों में पहने जाने वाले इस आभूषण के घुंघरूओं की सुमधुर ध्वनि से घर के हर सदस्य को नववधू की आहट का संकेत मिलता है।