पैसों की बरकत नहीं रहती? पर्स अक्सर खाली रहने लगा है। जीवन में मुश्किलों से जुझ रहे हैं, तो नीचे लिखे इस टोटके को अपनाकर कोई भी पैसों की परेशानी से निजात पा सकता हैं।
- लक्ष्मी का स्वरूप माना जाने वाला एकाक्षरी बीज मंत्र ह्रीं बहुत प्रभावशाली और चमत्कारी है। - किसी भी शनिवार के दिन सुबह स्नान आदि से निपट कर शनि की होरा में एक साबुत पीपल का पत्ता तोड़कर ले आएं। - मन में ऊं नमो: नारायण मंत्र का जप करते रहे। - फिर उस पत्ते को गंगाजल या किसी तीर्थ स्थल के जल से धोकर उस पर अष्टगंध की स्याही से अपने हाथ की अनामिका अंगुली से ह्रीं लिख लें। - उसके बाद धूप-दीप करने के बाद उक्त पत्ते को नये पत्ते से बदल लें। - पुराने पत्ते को किसी बहते जल में प्रवाहित कर दें। नये पत्ते को आप अपनी दुकान आदि में पैसे रखने के स्थान पर या जेब में पर्स भी रख सकते हैं।- विशेष ध्यान यह रहे कि पत्ता नीचे रखें।
Sunday, October 31, 2010
भक्त महालक्ष्मी का प्रिय हो जाता
जीवन धन अभाव में परेशानियों और दुखों से भरा है, उसके लिए एक अचूक लक्ष्मी मंत्र है। इस मंत्र के प्रभाव से बहुत गरीब लोगों को भी अच्छा धन प्राप्त होने के योग बन जाते हैं।मंत्र सिद्ध होने के बाद साधक को कभी भी धन की कमी नहीं होती। इस मंत्र जप से भक्त महालक्ष्मी का प्रिय हो जाता है और देवी लक्ष्मी उस पर सदैव अपनी कृपा बरसाती रहती हैं।
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं दरिद्रय विनाशके जगत्प्रसूत्यै नम:
इस मंत्र को सिद्ध करने के लिए दीपावली के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें, सभी आवश्यक कार्यों से निवृत्त हो जाएं। फिर घर में किसी पवित्र स्थान पर महालक्ष्मी का चित्र स्थापित करें। चित्र के समक्ष घी का दीपक, अगरबत्ती आदि लगाएं। मां लक्ष्मी के सामने बैठकर उक्त मंत्र की 11 मालाएं जपें। माला कमलगट्टे की होनी चाहिए। मंत्र जप के समय दीपक जलता रहना चाहिए।
दीपावली के दिन 11 मालाएं जप करने के बाद प्रतिदिन अपने सामथ्र्य के अनुसार इस मंत्र का जप करें। 12 लाख मंत्र जप के बाद यह सिद्ध हो जाता है और देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद साधक को प्राप्त हो जाता है। इसका शुभ प्रभाव कुछ दिनों में दिखाई देने लगेगा। इस दौरान किसी भी प्रकार का अधार्मिक कृत्य ना करें। अन्यथा मंत्र लाभदायक नहीं होगा।
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं दरिद्रय विनाशके जगत्प्रसूत्यै नम:
इस मंत्र को सिद्ध करने के लिए दीपावली के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें, सभी आवश्यक कार्यों से निवृत्त हो जाएं। फिर घर में किसी पवित्र स्थान पर महालक्ष्मी का चित्र स्थापित करें। चित्र के समक्ष घी का दीपक, अगरबत्ती आदि लगाएं। मां लक्ष्मी के सामने बैठकर उक्त मंत्र की 11 मालाएं जपें। माला कमलगट्टे की होनी चाहिए। मंत्र जप के समय दीपक जलता रहना चाहिए।
दीपावली के दिन 11 मालाएं जप करने के बाद प्रतिदिन अपने सामथ्र्य के अनुसार इस मंत्र का जप करें। 12 लाख मंत्र जप के बाद यह सिद्ध हो जाता है और देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद साधक को प्राप्त हो जाता है। इसका शुभ प्रभाव कुछ दिनों में दिखाई देने लगेगा। इस दौरान किसी भी प्रकार का अधार्मिक कृत्य ना करें। अन्यथा मंत्र लाभदायक नहीं होगा।
Saturday, October 30, 2010
लक्ष्मी स्तवन का पाठ
महालक्ष्मी की पूजा-उपासना लोक पंरपराओं में प्राय: धन-दौलत की परेशानियों को दूर करने का एक धार्मिक उपाय अधिक दिखाई देता है। माता लक्ष्मी प्रकाश की ही प्रतीक है और प्रकाश ज्ञान का यानि मां लक्ष्मी जागरण का संदेश देती है। दीपावली पर की जाने वाली रोशनी भी जागकर उठ खड़े होने को ही प्रेरित करती है। सरल शब्दों में जब आप विचार, व्यवहार, दृष्टि की मलीनता दूर कर सद्गुणों को अपनाने की शुरुआत करते हैं, तब खुशहाली के दरवाजे खुल जाते हैं। जिंदगी खुशियों की रोशनी से जगमगा जाती है। धार्मिक आस्था भी यही है कि खुले दरवाजों में माता लक्ष्मी प्रवेश करती है।
माता लक्ष्मी के आवाहन, ध्यान और प्रसन्नता के लिए धर्म शास्त्रों में तरह-तरह के सूक्त, स्त्रोत और मंत्र बताए गए हैं। इनमें से ही एक है लक्ष्मी स्तवन। इस लक्ष्मी स्तवन का पाठ हर लक्ष्मी पूजा, शुक्रवार को वैभव लक्ष्मी पूजा, दीपावली, धनतेरस या अन्य किसी भी विशेष लक्ष्मी पूजा की आरंभ में करने पर वैभव, ऐश्वर्य के साथ मनोरथ पूर्ति करता है। संस्कृत भाषा या व्याकरण की जानकारी के अभाव में आप इसकी हिन्दी अर्थ का भी पाठ कर लक्ष्मी की प्रसन्नता से दरिद्रता दूर कर सकते हैं।
लक्ष्मी स्तवन -
या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी ।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी ॥
या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी ।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥
इस लक्ष्मी स्तवन का सरल अर्थ है - लाल कमल पर रहने वाली, अद्भुत आभा और कांतिवाली, असह्य तेजवाली, रक्त की भाति लाल रंग वस्त्र धारण करने वाली, मन को आनंदित करने वाली, समुद्रमंथन से प्रकट हुईं विष्णु भगवान की पत्नी, भगवान विष्णु को अति प्रिय, कमल से जन्मी है और अतिशय पूज्य मां लक्ष्मी आप मेरी रक्षा करें और मनोरथ पूरे कर जीवन वैभव और ऐश्वर्य से भर दे।
माता लक्ष्मी के आवाहन, ध्यान और प्रसन्नता के लिए धर्म शास्त्रों में तरह-तरह के सूक्त, स्त्रोत और मंत्र बताए गए हैं। इनमें से ही एक है लक्ष्मी स्तवन। इस लक्ष्मी स्तवन का पाठ हर लक्ष्मी पूजा, शुक्रवार को वैभव लक्ष्मी पूजा, दीपावली, धनतेरस या अन्य किसी भी विशेष लक्ष्मी पूजा की आरंभ में करने पर वैभव, ऐश्वर्य के साथ मनोरथ पूर्ति करता है। संस्कृत भाषा या व्याकरण की जानकारी के अभाव में आप इसकी हिन्दी अर्थ का भी पाठ कर लक्ष्मी की प्रसन्नता से दरिद्रता दूर कर सकते हैं।
लक्ष्मी स्तवन -
या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी ।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी ॥
या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी ।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥
इस लक्ष्मी स्तवन का सरल अर्थ है - लाल कमल पर रहने वाली, अद्भुत आभा और कांतिवाली, असह्य तेजवाली, रक्त की भाति लाल रंग वस्त्र धारण करने वाली, मन को आनंदित करने वाली, समुद्रमंथन से प्रकट हुईं विष्णु भगवान की पत्नी, भगवान विष्णु को अति प्रिय, कमल से जन्मी है और अतिशय पूज्य मां लक्ष्मी आप मेरी रक्षा करें और मनोरथ पूरे कर जीवन वैभव और ऐश्वर्य से भर दे।
Friday, October 29, 2010
धनदायक है नागकेसर
नागकेसर को तंत्र के अनुसार एक बहुत ही शुभ वनस्पति माना गया है। काली मिर्च के समान गोल या कबाब चीनी की भांति दाने में डंडी लगी हुई गेरू के रंग का यह गोल फूल होता है। इसकी गिनती पूजा- पाठ के लिए पवित्र पदार्थो में की जाती है।तंत्र के अनुसार नागकेसर एक धनदायक वस्तु है। नीचे लिखे इस धन प्राप्ति के प्रयोग को अपनाकर आप भी धनवान बन सकते हैं।
- किसी पूर्णिमा को सोमवार हो उस दिन यह प्रयोग करें।- किसी भी मन्दिर में शिवलिंग पर पांच बिल्वपत्रों के साथ यह फूल भी चढ़ा दीजिए। इससे पूर्व शिवलिंग को कच्चे दूध, दही, शक्कर, घी, गंगाजल, आदि से धोकर पवित्र करें। - पांच बिल्व पत्र और नागकेशर के फूल की संख्या हर बार एक ही रखना चाहिए।- अगली पूर्णिमा तक निरंतर चढ़ाते रहे।- आखिरी दिन चढ़ाये गये फूल तथा बिल्व पत्रों में से एक अपने घर ले आए। धन सम्पदा अर्जित करवाने में नागकेशर फूल चमत्कारी प्रभाव दिखाते हैं।
बुरी आत्माओं से रक्षा करता है ये डाग
कुत्ते बहादुरी और वफादारी का प्रतीक माने जाते हैं। चीन में भी बहादुर कुत्ते मतलब फूडाग का प्रचलन है। इसके प्रतीकों का जोड़ा घर के बाहर रखा जाता है। जिससे नकारात्मक उर्जा घर से आने से रोका जा सकता है।
फूडाग का प्रतीक बुरी नजर से भी बचाव कर देता है। फूडाग को खरीदते समय ध्यान रखना चाहिए। बच्चे के साथ मादा और नर को दरवाजे के दोनों तरफ लगाते हैं। यह जोड़ा लगाते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नर फूडाग को दांयी ओर तथा मादा फूडाग को बाईं ओर रखना चाहिए। इन कुत्तो का स्वरूप शेर से मिलता- जुलता लगता है। ये डाग बुरी आत्माओं से भी घर की रक्षा करता है।
- किसी पूर्णिमा को सोमवार हो उस दिन यह प्रयोग करें।- किसी भी मन्दिर में शिवलिंग पर पांच बिल्वपत्रों के साथ यह फूल भी चढ़ा दीजिए। इससे पूर्व शिवलिंग को कच्चे दूध, दही, शक्कर, घी, गंगाजल, आदि से धोकर पवित्र करें। - पांच बिल्व पत्र और नागकेशर के फूल की संख्या हर बार एक ही रखना चाहिए।- अगली पूर्णिमा तक निरंतर चढ़ाते रहे।- आखिरी दिन चढ़ाये गये फूल तथा बिल्व पत्रों में से एक अपने घर ले आए। धन सम्पदा अर्जित करवाने में नागकेशर फूल चमत्कारी प्रभाव दिखाते हैं।
बुरी आत्माओं से रक्षा करता है ये डाग
कुत्ते बहादुरी और वफादारी का प्रतीक माने जाते हैं। चीन में भी बहादुर कुत्ते मतलब फूडाग का प्रचलन है। इसके प्रतीकों का जोड़ा घर के बाहर रखा जाता है। जिससे नकारात्मक उर्जा घर से आने से रोका जा सकता है।
फूडाग का प्रतीक बुरी नजर से भी बचाव कर देता है। फूडाग को खरीदते समय ध्यान रखना चाहिए। बच्चे के साथ मादा और नर को दरवाजे के दोनों तरफ लगाते हैं। यह जोड़ा लगाते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नर फूडाग को दांयी ओर तथा मादा फूडाग को बाईं ओर रखना चाहिए। इन कुत्तो का स्वरूप शेर से मिलता- जुलता लगता है। ये डाग बुरी आत्माओं से भी घर की रक्षा करता है।
पूजा के दीपक
देवी-देवताओं की पूजा में आरती सबसे महत्वपूर्ण कर्म है। आरती के साथ ही पूजा-अर्चना पूर्ण होती है। पूजा में आरती के महत्व को देखते हुए दीपक तैयार करते समय कई सावधानियां रखनी अनिवार्य है। विधि-विधान से तैयार किए गए दीपक से देवी-देवताओं की कृपा जल्दी ही
- देवताओं को घी का दीपक अपनी बायीं ओर तथा तेल का दीपक दायीं ओर लगाना चाहिए।- देवी-देवताओं को लगाया गया दीपक पूजन कार्य के बीच बुझना नहीं चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखें।- दीपक हमेशा भगवान के सामने ही लगाएं।- घी के दीपक के लिए सफेद रुई की बत्ती लगाएं।- तेल के दीपक के लिए लाल बत्ती का उपयोग किया जाना चाहिए।- दीपक कहीं से खंडित या टूटा नहीं होना चाहिए।
- देवताओं को घी का दीपक अपनी बायीं ओर तथा तेल का दीपक दायीं ओर लगाना चाहिए।- देवी-देवताओं को लगाया गया दीपक पूजन कार्य के बीच बुझना नहीं चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखें।- दीपक हमेशा भगवान के सामने ही लगाएं।- घी के दीपक के लिए सफेद रुई की बत्ती लगाएं।- तेल के दीपक के लिए लाल बत्ती का उपयोग किया जाना चाहिए।- दीपक कहीं से खंडित या टूटा नहीं होना चाहिए।
Thursday, October 28, 2010
कामयाबी के लिए करें गुरु पूजा
गुरुवार का दिन बृहस्पति या गुरु की उपासना को समर्पित है। बृहस्पति देवगुरु माने जाते हैं। गुरु शुभ ग्रह माना जाता है। यह व्यक्ति के जीवन में विद्या, ज्ञान, संतान सुख को भी नियत करता है। मीन और धनु राशि के स्वामी गुरु है। गुरु मकर राशि में बुरे फल देता है। इसके विपरीत कर्क राशि में होने पर यह शुभ प्रभाव देते हैं।
स्त्री और पुरुष के खुशहाल दाम्पत्य में गुरु की भूमिका अहम होती है। गुरु पुरुष तत्व का कारक है। इसलिए पुरुष के साथ ही खासतौर पर स्त्री के विवाह आ रही रुकावटों को गुरु की प्रसन्नता से दूर करने के लिए गुरुवार का व्रत श्रेष्ठ माना जाता है।
ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार कुण्डली में गुरु ग्रह के शुभ प्रभाव से व्यक्ति सरल, शांत, धार्मिक, आध्यात्मिक और खुबसूरत व्यक्तित्व का होता है। गुरु के अच्छा-बुरा असर ही व्यक्ति की तकदीर का फैसला करता है। कुण्डली में बुरे योग से शरीर में रोग जैसे मधुमेह, लीवर या वात रोग पैदा होते हैं। बुरी घटना भी हो सकती है। वहीं बिजनेस, पढ़ाई और अदालती मामलों में कामयाबी या नाकामी गुरु के अच्छे-बुरे असर से निश्चित होती है।
गुरुवार के दिन गुरु की उपासना और व्रत कर गुरु के शुभ प्रभाव से वैवाहिक, कारोबारी, मानसिक और व्यावहारिक परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए यहां बताई जा रही गुरुवार व्रत और पूजा की सरल विधि -
- गुरुवार के दिन सबेरे स्नान करें। यथासंभव पीले वस्त्र पहनें।- एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु बृहस्पति की प्रतिमा को किसी पात्र में रखकर स्थापित करें। - अगर कोई पुरुष जनेऊधारी है तो गुरु की पूजा के समय जनेऊ जरुर पहनें।
- गुरुदेव की गंध, अक्षत, पीले वस्त्र, पीले फूल, चमेली के फूलों से पूजा-अर्चना करें।- पीली वस्तुओं जैसे चने की दाल से बने पकवान, चने, गुड़ या पीले फलों का भोग लगाएं।- गुरुवार व्रत कथा करें। बृहस्पति आरती करें। क्षमा प्रार्थना कर मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें।- इस दिन किसी पात्र ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए या उनके निमित्त भोजन सामग्री दान देनी चाहिए। - पीले रंग की सामग्री और दक्षिणा देनी चाहिए। - समर्थ हो तो सोने का दान बहुत शुभ फल देता है। सोने की धातु के स्वामी गुरु को ही है। - ब्राह्मण के भोजन या दान के बाद ही व्रती भोजन करें। ऐसे सात गुरुवार लगातार व्रत करें।
धार्मिक दृष्टि से गुरुवार के व्रत, पूजा-उपासना से कुण्डली में बनी गुरु ग्रह दोष शांति होती है। सुख-समृद्धि के साथ विशेष तौर पर कारोबार में फायदे, अच्छी शिक्षा, योग्य वर या वधू पाने के सपने पूरे होते हैं।
स्त्री और पुरुष के खुशहाल दाम्पत्य में गुरु की भूमिका अहम होती है। गुरु पुरुष तत्व का कारक है। इसलिए पुरुष के साथ ही खासतौर पर स्त्री के विवाह आ रही रुकावटों को गुरु की प्रसन्नता से दूर करने के लिए गुरुवार का व्रत श्रेष्ठ माना जाता है।
ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार कुण्डली में गुरु ग्रह के शुभ प्रभाव से व्यक्ति सरल, शांत, धार्मिक, आध्यात्मिक और खुबसूरत व्यक्तित्व का होता है। गुरु के अच्छा-बुरा असर ही व्यक्ति की तकदीर का फैसला करता है। कुण्डली में बुरे योग से शरीर में रोग जैसे मधुमेह, लीवर या वात रोग पैदा होते हैं। बुरी घटना भी हो सकती है। वहीं बिजनेस, पढ़ाई और अदालती मामलों में कामयाबी या नाकामी गुरु के अच्छे-बुरे असर से निश्चित होती है।
गुरुवार के दिन गुरु की उपासना और व्रत कर गुरु के शुभ प्रभाव से वैवाहिक, कारोबारी, मानसिक और व्यावहारिक परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए यहां बताई जा रही गुरुवार व्रत और पूजा की सरल विधि -
- गुरुवार के दिन सबेरे स्नान करें। यथासंभव पीले वस्त्र पहनें।- एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर गुरु बृहस्पति की प्रतिमा को किसी पात्र में रखकर स्थापित करें। - अगर कोई पुरुष जनेऊधारी है तो गुरु की पूजा के समय जनेऊ जरुर पहनें।
- गुरुदेव की गंध, अक्षत, पीले वस्त्र, पीले फूल, चमेली के फूलों से पूजा-अर्चना करें।- पीली वस्तुओं जैसे चने की दाल से बने पकवान, चने, गुड़ या पीले फलों का भोग लगाएं।- गुरुवार व्रत कथा करें। बृहस्पति आरती करें। क्षमा प्रार्थना कर मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें।- इस दिन किसी पात्र ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए या उनके निमित्त भोजन सामग्री दान देनी चाहिए। - पीले रंग की सामग्री और दक्षिणा देनी चाहिए। - समर्थ हो तो सोने का दान बहुत शुभ फल देता है। सोने की धातु के स्वामी गुरु को ही है। - ब्राह्मण के भोजन या दान के बाद ही व्रती भोजन करें। ऐसे सात गुरुवार लगातार व्रत करें।
धार्मिक दृष्टि से गुरुवार के व्रत, पूजा-उपासना से कुण्डली में बनी गुरु ग्रह दोष शांति होती है। सुख-समृद्धि के साथ विशेष तौर पर कारोबार में फायदे, अच्छी शिक्षा, योग्य वर या वधू पाने के सपने पूरे होते हैं।
शाम का समय देवताओं की आराधना का
कई लोग समय की कमी के कारण शाम के वक्त आराम करते हैं। यहां आराम करने से हमारा मतलब है-सोने से। शाम को सोना शास्त्रों की दृष्टि से अनुचित माना जाता है।
वैसे देखा जाए तो सोने के रात्रि को ही श्रेष्ठ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार तो दिन भी नहीं सोना चाहिए। दिन में सोने से आयु घटती है, शरीर पर अनावश्यक चर्बी बढ़ती है, आलस्य बढ़ता है आदि। दिन में सोना प्रतिबन्धित है। सिर्फ वृद्ध, बालक एवं रोगियों के मामले में यहां स्वीकृति है।जब शास्त्रों में दिन में सोने पर पाबंदी है तो शाम का समय तो वैसे भी संध्या-आचमन का होता है। शाम का समय देवताओं की आराधना एवं संध्या का होता है।
इस समय सोने से शरीर में शिथिलता आती है और नकारात्मक विचारों का आगमन होता है। इस समय तो पूरे भक्तिभाव से भगवान की पूजा-अर्चना एवं संध्या करनी चाहिए।
शाम को सोने के साथ ही खाना खाना, पढ़ाई करना एवं मैथुन कर्म करना भी वर्जित है। कहते हैं इन कर्मों को शाम को करने से आयु तो घटती ही है, साथ ही यश, लक्ष्मी, विद्या आदि सभी का नाश हो जाता है। इसलिए शाम को सोना शास्त्रोक्त विधान के अनुसार अनुचित माना गया है।
वैसे देखा जाए तो सोने के रात्रि को ही श्रेष्ठ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार तो दिन भी नहीं सोना चाहिए। दिन में सोने से आयु घटती है, शरीर पर अनावश्यक चर्बी बढ़ती है, आलस्य बढ़ता है आदि। दिन में सोना प्रतिबन्धित है। सिर्फ वृद्ध, बालक एवं रोगियों के मामले में यहां स्वीकृति है।जब शास्त्रों में दिन में सोने पर पाबंदी है तो शाम का समय तो वैसे भी संध्या-आचमन का होता है। शाम का समय देवताओं की आराधना एवं संध्या का होता है।
इस समय सोने से शरीर में शिथिलता आती है और नकारात्मक विचारों का आगमन होता है। इस समय तो पूरे भक्तिभाव से भगवान की पूजा-अर्चना एवं संध्या करनी चाहिए।
शाम को सोने के साथ ही खाना खाना, पढ़ाई करना एवं मैथुन कर्म करना भी वर्जित है। कहते हैं इन कर्मों को शाम को करने से आयु तो घटती ही है, साथ ही यश, लक्ष्मी, विद्या आदि सभी का नाश हो जाता है। इसलिए शाम को सोना शास्त्रोक्त विधान के अनुसार अनुचित माना गया है।
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