राहु को पौराणिक ग्रंथों में सांप का सिर और केतु को उसका धड़ कहा गया है। राहु और केतु के बीच जब सब ग्रह आ जाते हैं तो कालसर्प नाम का अशुभ योग बनता है। राहु पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है। इसकी अपनी कोई राशि नहीं होती है, इसलिए कुंडली में यह जिस राशि और ग्रह के साथ में होता है उसके अनुसार फल देता है। राहु पाप ग्रह होने के कारण हमेशा बुरा फल दे यह जरूरी नही है। कुंडली में धन प्राप्त हाने के योग भी राहु के द्वारा बन सकते हैं
अष्टलक्ष्मी योग- जब किसी कुंडली में राहु छठे भाव में होता है और 1, 4, 7, 10वें भाव में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग बनता है। पापी ग्रह राहु, गुरु के समान अच्छा फल देता है। यह योग जिसकी कुण्डली में होता है वह व्यक्ति धार्मिक, आस्तिक एवं शान्त स्वभाव वाला होता है और यश व सम्मान के साथ-साथ धनवान हो जाता है।
लग्न कारक योग- अगर किसी का लग्र मेष, वृष या कर्क लग्न है तभी यह योग बनता है। कुण्डली में राहु दुसरे, 9वें या दसवें भाव में नहीं है तो उनकी कुंडली में ये योग होता है। कुंडली की इस स्थिति से राहु का अशुभ प्रभाव नही होता क्योंकि उपर बताए गए लग्र वालों के लिए राहु शुभ फल देने वाला होता है। ऐसे लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है।
राहुकोप मुक्त योग- राहु पहले भाव में हो या तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में होता है और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो यह योग बनता है। ऐसे में व्यक्ति पर राहु के अशुभ प्रभाव नही पड़ते। ऐसे व्यक्तियों के सभी काम आसानी से होते हैं और उनके जीवन में कभी पैसों की कमी नही होती।
राहु की महादशा लगने पर मानते हैं कि जैसे सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन ऐसा नहीं है। राहु और उसकी महादशा हर समय नुकसानदायक नहीं होती। राहु रंक को भी राजा बनाने की क्षमता रखता है। राहु की महादशा में विदेश जाने से बहुत लाभ होता है। विदेश का मतलब है वर्तमान निवास से दूर जाकर कार्य करने से सफलता मिलती है। अगर कुंडली में राहु , चौथे, दसवें, ग्यारहवें या नवें स्थान में अपने मित्र ग्रहों की राशि यानी शनि और शुक्र की राशि (मकर, कुंभ, वृषभ या तुला) में स्थित होता है तो बहुत सफलता दिलाता है।वहीं राहु यदि मिथुन राशि में हो तो कई ज्योतिष विद्वानों द्वारा उच्च का माना जाता है। राहु एक छाया ग्रह है। यह किसी भी राशि का स्वामी नही है। लेकिन यह जिसके अनुकुल हो जाता है उसे जीवन मे बहुत मान सम्मान प्रतिष्ठा और पद प्राप्त होता है। राजनितिज्ञों के लिए तो राहु का अनूकुल होना अत्यधिक फायदेमंद होता है। राहु के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए शनिवार के दिन अपना उपयोग किया हुआ कंबल किसी गरीब को दान करें। काले कुत्ते को रोटी खिलाएं। अमावस्या को पीपल पर रात में 12 बजे दीपक जलाएं। शनिवार को उड़द के बड़े बनाकर खाएं। -शिवजी पर जल, धतुरा के बीज, चढ़ाएं और सोमवार का व्रत करें।
Saturday, February 26, 2011
Friday, February 25, 2011
लिंगाष्टक : बाधा दूर करने वाला
शिवलिंग पूजा सभी सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति करने वाली मानी गई है, जो शिवलिंग पर मात्र जल और बिल्वपत्र चढ़ाने मात्र से भी पूरी हो जाती हैं। महाशिवरात्रि शिवलिंग के प्रागट्य का ही शुभ दिन है। इसलिए इस दिन शिव उपासना में लिंगाष्टक का पाठ बहुत ही शुभ फल देने वाला होता है। जिससे कामना सिद्धि के साथ भाग्य या संतान बाधा दूर करने वाला भी माना गया है। शिव की महिमा का यह अद्भुत पाठ इस प्रकार है :
ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं निर्मलभाषितशोभित लिंग,
जन्मजदुःखविनाशक लिंग तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं, कामदहं करुणाकर लिंगं,
रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
सर्वसुगंन्धिसुलेपित लिंगं, बुद्धिविवर्धनकारण लिंगं
सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
कनकमहामणिभूषित लिंगं, फणिपतिवेष्टितशोभित लिंगं,
दक्षसुयज्ञविनाशन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
कुंकुमचंदनलेपित लिंगं, पंकजहारसुशोभित लिंगं,
संञ्चितपापविनाशिन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
देवगणार्चितसेवित लिंग, भवैर्भक्तिभिरेवच लिंगं,
दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं, सर्वसमुद्भवकारण लिंगं,
अष्टदरिद्रविनाशित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
सुरगुरूसुरवरपूजित लिंगं, सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगं,
परात्परं परमात्मक लिंगं, ततप्रणमामि सदाशिव लिंगं
ब्रह्ममुरारिसुरार्चित लिगं निर्मलभाषितशोभित लिंग,
जन्मजदुःखविनाशक लिंग तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
देवमुनिप्रवरार्चित लिंगं, कामदहं करुणाकर लिंगं,
रावणदर्पविनाशन लिंगं तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
सर्वसुगंन्धिसुलेपित लिंगं, बुद्धिविवर्धनकारण लिंगं
सिद्धसुरासुरवन्दित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
कनकमहामणिभूषित लिंगं, फणिपतिवेष्टितशोभित लिंगं,
दक्षसुयज्ञविनाशन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
कुंकुमचंदनलेपित लिंगं, पंकजहारसुशोभित लिंगं,
संञ्चितपापविनाशिन लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
देवगणार्चितसेवित लिंग, भवैर्भक्तिभिरेवच लिंगं,
दिनकरकोटिप्रभाकर लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
अष्टदलोपरिवेष्टित लिंगं, सर्वसमुद्भवकारण लिंगं,
अष्टदरिद्रविनाशित लिंगं, तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं
सुरगुरूसुरवरपूजित लिंगं, सुरवनपुष्पसदार्चित लिंगं,
परात्परं परमात्मक लिंगं, ततप्रणमामि सदाशिव लिंगं
सड़क दुर्घटना का खतरा
लापरवाही जीवन के खतरनाक होती है। कुछ लोगों पूरी सावधानी के साथ चलते हैं फिर भी दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में कुछ ग्रह दुर्घटना से संबंधित बताए गए हैं। ज्योतिष शास्त्र से जाना जा सकता है यदि किसी के साथ वाहन दुर्घटना या अन्य कोई एक्सीडेंट से नुकसान होने के योग हों। मंगल, शनि, राहु या सूर्य इनमें से कोई एक ग्रह अष्टम स्थान मे हो तथा इन पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तब दुर्घटना के योग बनाते हैं। इन चारों ग्रहों में से कोई एक ग्रह भी पाप ग्रह के साथ हो तो सड़क दुर्घटना का भय रहता है। पितृ दोष का विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है, पितृदोष भी दुर्घटना का कारण होता हैं। स्त्री की पत्रिका में उसके पति की आयु का विचार अष्टम भाव से होता है। नवांश कुंडली मे सूर्य-मंगल यदि एक दूसरे पर दृष्टि रखते हों तो भी सड़क दुर्घटना का खतरा बनता है। राहु की महादशा हो तथा सूर्य या चंद्र अष्टम स्थित हो, तो भी यह खतरा बना रहता है। द्वितीय भाव दूषित होने पर भी यह खतरा मंडराता है। दुर्घटना के योग बचने के लिए अष्टम भाव में स्थित अशुभ ग्रह का उपचार कराएं। श्री हनुमानजी का पूजन करें। शिवजी का अभिषेक करें। वाहन चलाते समय पूरी सावधानी रखें और यातायात के नियमों का पालन करें।
Wednesday, February 23, 2011
सात दिनों की प्रकृति और स्वभाव
सप्ताह के सात दिनों की प्रकृति और स्वभाव बताए गए हैं। इन की प्रकृति और स्वभाव के अनुसार कार्यों को करें तो आपको निश्चत ही हर काम में सफलता मिलेगी। सोचे हुए कार्य पूरे नही होते या उनका काई परिणाम नही मिलता तो उन कार्यों को पुराणों, मुहूर्त ग्रंथों और फलति ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार बताए गए वार को करें। जरूर सफल होंगे।
रविवार- यह सूर्य देव का वार माना गया है। इस दिन नवीन गृह प्रवेश और सरकारी कार्य करना चाहिए। सोने के आभूषण और तांबे की वस्तुओं का क्रय विक्रय करना चाहिए या इन धातुओं के आभूषण पहनना चाहिए।
सोमवार- सरकारी नौकरी वालों के लिए पद ग्रहण करने के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है। गृह शुभारम्भ, कृषि, लेखन कार्य और दूध, घी व तरल पदार्थों का क्रय विक्रय करना इस दिन फायदेमंद हो सकता है।
मंगलवार- मंगल देव के इस दिन विवाद एवं मुकद्दमे से संबंधित कार्य करने चाहिए। शस्त्र अभ्यास, शौर्य और पराक्रम के कार्य इस दिन करने से उस कार्य में सफलता मिलती है। मेडिकल से संबंधित कार्य और ऑपरेशन इस दिन करने से सफलता मिलती है। बिजली और अग्नि से संबधित कार्य इस दिन करें तो अवश्य ही लाभ मिलेगा। सभी प्रकार की धातुओं का क्रय विक्रय करना चाहिए।
बुधवार- इस दिन यात्रा करना, मध्यस्थता करना, योजना बनाना आदि कार्य करने चाहिए। लेखन, शेयर मार्केट का कार्य, व्यापारिक लेखा-जोखा आदि का कार्य करना चाहिए।
गुरुवार- बृहस्पति देव के इस दिन यात्रा, धार्मिक कार्य, विद्याध्ययन और बैंक से संबंधित कार्र्य करना चाहिए। इस दिन वस्त्र आभूषण खरीदना, धारण करना और प्रशासनिक कार्य करना शुभ माना गया है।
शुक्रवार- शुक्रवार के दिन गृह प्रवेश, कलात्मक कार्य, कन्या दान, करने का महत्व है। शुक्र देव भौतिक सुखों के स्वामी है। इसलिए इस दिन सुख भोगने के साधनों का उपयोग करें। सौंदर्य प्रसाधन, सुगन्धित पदार्थ, वस्त्र, आभूषण, वाहन आदि खरीदना लाभ दायक होता है।
शनिवार- मकान बनाना , टेक्रीकल कार्य, गृह प्रवेश, ऑपरेशन आदि काम करने चाहिए। प्लास्टिक , लकड़ी , सीमेंट, तेल, पेट्रोल खरीदना और वाद-विवाद के लिए जाना इस दिन सफलता देने वाला होता है।
रविवार- यह सूर्य देव का वार माना गया है। इस दिन नवीन गृह प्रवेश और सरकारी कार्य करना चाहिए। सोने के आभूषण और तांबे की वस्तुओं का क्रय विक्रय करना चाहिए या इन धातुओं के आभूषण पहनना चाहिए।
सोमवार- सरकारी नौकरी वालों के लिए पद ग्रहण करने के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है। गृह शुभारम्भ, कृषि, लेखन कार्य और दूध, घी व तरल पदार्थों का क्रय विक्रय करना इस दिन फायदेमंद हो सकता है।
मंगलवार- मंगल देव के इस दिन विवाद एवं मुकद्दमे से संबंधित कार्य करने चाहिए। शस्त्र अभ्यास, शौर्य और पराक्रम के कार्य इस दिन करने से उस कार्य में सफलता मिलती है। मेडिकल से संबंधित कार्य और ऑपरेशन इस दिन करने से सफलता मिलती है। बिजली और अग्नि से संबधित कार्य इस दिन करें तो अवश्य ही लाभ मिलेगा। सभी प्रकार की धातुओं का क्रय विक्रय करना चाहिए।
बुधवार- इस दिन यात्रा करना, मध्यस्थता करना, योजना बनाना आदि कार्य करने चाहिए। लेखन, शेयर मार्केट का कार्य, व्यापारिक लेखा-जोखा आदि का कार्य करना चाहिए।
गुरुवार- बृहस्पति देव के इस दिन यात्रा, धार्मिक कार्य, विद्याध्ययन और बैंक से संबंधित कार्र्य करना चाहिए। इस दिन वस्त्र आभूषण खरीदना, धारण करना और प्रशासनिक कार्य करना शुभ माना गया है।
शुक्रवार- शुक्रवार के दिन गृह प्रवेश, कलात्मक कार्य, कन्या दान, करने का महत्व है। शुक्र देव भौतिक सुखों के स्वामी है। इसलिए इस दिन सुख भोगने के साधनों का उपयोग करें। सौंदर्य प्रसाधन, सुगन्धित पदार्थ, वस्त्र, आभूषण, वाहन आदि खरीदना लाभ दायक होता है।
शनिवार- मकान बनाना , टेक्रीकल कार्य, गृह प्रवेश, ऑपरेशन आदि काम करने चाहिए। प्लास्टिक , लकड़ी , सीमेंट, तेल, पेट्रोल खरीदना और वाद-विवाद के लिए जाना इस दिन सफलता देने वाला होता है।
Sunday, February 20, 2011
धन-धान्य की कमी न हो
हर व्यक्ति चाहता है कि वह सुख-शांतिपूर्ण तरीके से जीवन जीए। कभी धन-धान्य की कमी न हो। इसके लिए वह दिन-रात मेहनत भी करता है। लेकिन इतना सब करने के बाद भी ऐसा नहीं हो पाता जैसा वह चाहता है। कुछ साधारण तांत्रिक उपाय करने पर जीवन को सुखी व शांतिपूर्ण बनाया जा सकता है।
- प्रतिदिन सुबह एक लौटे में पानी लेकर उसमें फूल, कुंकुम व चावल डालकर बरगद के पेड़ की जड़ में डालें तथा गाय को गुड़ व रोटी खिलाएं। ऐसा करने से आपके जीवन में सुख-शांति बनी रहेगी।
- सूर्यास्त के समय रोज आधा किलो कच्चे दूध में 9 बूंदें शहद मिलाकर घर के सभी कमरों में छींटे और फिर चौराहे पर जाकर वह दूध रखकर लौट आएं। लौटते समय पीछे पलटकर न देंखे। 21 दिन तक यह टोटका करने से घर में जितनी भी नकारात्मक शक्तियां होती हैं स्वत: ही दूर चली जाती हैं और शांति का अनुभव होता है।
- प्रतिदिन सुबह नहाकर घर के प्रत्येक सदस्य के मस्तक पर चंदन का तिलक लगाने से भी परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती हैं तथा धन-वैभव बढ़ता है।
- किसी भी महीने के कृष्ण पक्ष में शनिवार के दिन नाव की कील से बना लॉकेट गले में धारण करने से समस्त प्रकार के दोषों का नाश हो जाता है तथा समृद्धि में वृद्धि होती है।
- शुक्रवार के दिन पीले कपड़े पर हल्दी की 7 साबूत गंाठ, 7 जनेऊ, 7 लग्नमंडप की सुपारी, गुड़ की 7 डली तथा 7 पीले फूल रखें। इसके पश्चात धूप-दीप से पूजा करें तथा इसे बांधकर तिजोरी या जहां आप पैसे रखते हैं, वहां रख दें। निश्चय ही इस टोटके से धन-धान्य में वृद्धि होगी।
- प्रतिदिन सुबह एक लौटे में पानी लेकर उसमें फूल, कुंकुम व चावल डालकर बरगद के पेड़ की जड़ में डालें तथा गाय को गुड़ व रोटी खिलाएं। ऐसा करने से आपके जीवन में सुख-शांति बनी रहेगी।
- सूर्यास्त के समय रोज आधा किलो कच्चे दूध में 9 बूंदें शहद मिलाकर घर के सभी कमरों में छींटे और फिर चौराहे पर जाकर वह दूध रखकर लौट आएं। लौटते समय पीछे पलटकर न देंखे। 21 दिन तक यह टोटका करने से घर में जितनी भी नकारात्मक शक्तियां होती हैं स्वत: ही दूर चली जाती हैं और शांति का अनुभव होता है।
- प्रतिदिन सुबह नहाकर घर के प्रत्येक सदस्य के मस्तक पर चंदन का तिलक लगाने से भी परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती हैं तथा धन-वैभव बढ़ता है।
- किसी भी महीने के कृष्ण पक्ष में शनिवार के दिन नाव की कील से बना लॉकेट गले में धारण करने से समस्त प्रकार के दोषों का नाश हो जाता है तथा समृद्धि में वृद्धि होती है।
- शुक्रवार के दिन पीले कपड़े पर हल्दी की 7 साबूत गंाठ, 7 जनेऊ, 7 लग्नमंडप की सुपारी, गुड़ की 7 डली तथा 7 पीले फूल रखें। इसके पश्चात धूप-दीप से पूजा करें तथा इसे बांधकर तिजोरी या जहां आप पैसे रखते हैं, वहां रख दें। निश्चय ही इस टोटके से धन-धान्य में वृद्धि होगी।
Saturday, February 19, 2011
संतान गोपाल मन्त्र
संतान के बिना गृहस्थ जीवन की खुशिययां अधूरी हो जाती हैं। धर्म के नजरिए से गृहस्थ जीवन की चार पुरूषार्थ में से एक काम की प्राप्ति में अहम भूमिका है। यही कारण है कि हर दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना करते हैं। आज के दौर में जहां पुत्रियां भी किसी भी क्षेत्र में पुत्रों से कम नहीं है। फिर भी अक्सर परंपराओं और धर्म से जुड़ी मान्यताओं के चलते हर कोई पुत्र कामना करता है। किंतु कभी-कभी यह देखा जाता है कि शारीरिक समस्या या किसी घटना के कारण संतान प्राप्ति में बाधाएं आती है, जो परिवार के माहौल में मायूसी और दु:ख पैदा करते हैं। शास्त्रों में संतान कामना को पूरा करने के ऐसे ही उपाय बताए गए हैं, जिनसे बिना किसी ज्यादा परेशानी या आर्थिक बोझ के मनचाही खुशियां मिलती हैं। यह उपाय है संतान गोपाल मन्त्र का जप। स्वस्थ्य, सुंदर संतान खासतौर पर पुत्र प्राप्ति के लिए यह मंत्र पति-पत्नी दोनों के द्वारा किया जाना बेहतर नतीजे देता है।
पति-पत्नी दोनों सुबह स्नान कर पूरी पवित्रता के साथ इस मंत्र का जप तुलसी की माला से करें। इसके लिए घर के देवालय में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र की चन्दन, अक्षत, फूल, तुलसी दल और माखन का भोग लगाकर घी के दीप व कर्पूर से आरती करें। बालकृष्ण की मूर्ति विशेष रूप से श्रेष्ठ मानी जाती है। भगवान की पूजा के बाद या आरती के पहले इस संतान गोपाल मंत्र का जप करें -
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:
मंत्र जप के बाद भगवान से समर्पित भाव से निरोग, दीर्घजीवी, अच्छे चरित्रवाला, सेहतमंद पुत्र की कामना करें। यह मंत्र जप पति या पत्नी अकेले भी कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इस मंत्र की 55 माला या यथाशक्ति जप के एक माह में चमत्कारिक फल मिलते हैं।
पति-पत्नी दोनों सुबह स्नान कर पूरी पवित्रता के साथ इस मंत्र का जप तुलसी की माला से करें। इसके लिए घर के देवालय में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र की चन्दन, अक्षत, फूल, तुलसी दल और माखन का भोग लगाकर घी के दीप व कर्पूर से आरती करें। बालकृष्ण की मूर्ति विशेष रूप से श्रेष्ठ मानी जाती है। भगवान की पूजा के बाद या आरती के पहले इस संतान गोपाल मंत्र का जप करें -
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:
मंत्र जप के बाद भगवान से समर्पित भाव से निरोग, दीर्घजीवी, अच्छे चरित्रवाला, सेहतमंद पुत्र की कामना करें। यह मंत्र जप पति या पत्नी अकेले भी कर सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में इस मंत्र की 55 माला या यथाशक्ति जप के एक माह में चमत्कारिक फल मिलते हैं।
अचूक शनि मंत्र
शनि दण्ड देने वाले देवता के रूप में पूजनीय है। शनि की टेढ़ी चाल किसी भी व्यक्ति को बेहाल कर सकती है। यही कारण है कि उनकी छबि क्रूर भी मानी जाती है। जिससे शनि की साढ़े साती, महादशा आदि में शनिदेव की उपासना का महत्व है। शनि के बुरे असर से अनेक तरह की पीड़ाएं मिलती है, किंतु इनमें से शारीरिक रोग की बात करें तो शनि दोष से पैरों की बीमारी, गैस की समस्या, लकवा, वात और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जिससे व्यक्ति की कमजोरी उसे सुख और आनंद से वंचित कर सकती है। शनि दोष से पैदा हुए ऐसे ही रोगों से छुटकारे और बचाव के लिए यह वैदिक शनि मंत्र अचूक माना गया है। इस मंत्र का जप स्वयं या किसी विद्वान ब्राह्मण से कराना रोगनाश के लिए अचूक माना जाता है।
शनि के इस खास मंत्र और सामान्य पूजा विधि :
शनिवार के दिन सुबह स्नान कर घर या नवग्रह मंदिर में शनिदेव की गंध, अक्षत, काले तिल, उड़द और तिल का तेल चढ़ाकर पूजा करें। पूजा के बाद शनि के इस वैदिक मंत्र का जप कम से कम 108 बारे जरूर करें -
ऊँ शन्नो देवीरभीष्टय, आपो भवन्तु पीतये। शं योरभिस्त्रवन्तु न:।।
मंत्र जप के बाद शनिदेव से पूजा या मंत्र जप में हुई गलती के लिए क्षमा मांग स्वयं या परिजन की बीमारी से मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। हिन्दू धर्म में प्रकृति को भी देव रूप मानता है। जिससे कोई भी इंसान चाहे वह धर्म को मानने वाला हो या धर्म विरोधी सीधे ही किसी न किसी रूप में प्रकृति और प्राणियों से प्रेम के द्वारा जुड़कर धर्म पालन कर ही लेता है। कुदरत की देव रूप उपासना का ही अंग हे पीपल पूजा। पीपल को अश्वत्थ भी कहा जाता है। शास्त्रों के मुताबिक पीपल देववृक्ष होकर इसमें त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। ब्रह्मा का स्थान जड़ में, विष्णु का मध्य भाग या तने और अगले भाग यानि शाखाओं में शिव का स्थान है। इस वृक्ष की टहनियों में त्रिदेव सहित इंद्र और गो, ब्राह्मण, यज्ञ, नदी और समुद्र देव वास भी माना जाता है। इसलिए यह वृक्ष पंचदेव, ऊंकार या कल्पवृक्ष के नाम से भी पूजित है।
पीपल वृक्ष की पूजा से सांसारिक जीवन के अनेक कष्टों का दूर करती है। यहां हम ग्रहदोष खासतौर पर शनि पीड़ा का अंत करने के लिए पीपल पूजा की सरल विधि जानते हैं -
स्नान कर सफेद वस्त्र पहन पीपल के व़ृक्ष के नीचे की जमीन गंगाजल से पवित्र करें। दु:खों को दूर करने के मानसिक संकल्प के साथ स्वस्तिक बनाकर पीपल में सात बार जल चढ़ाएं। सामान्य पूजा सामग्रियों कुंकुम, अक्षत, फूल चढ़ाकर भगवान विष्णु, लक्ष्मी, त्रिदेव, शिव-पार्वती का ध्यान करें। इन देवताओं के सरल मंत्रों का बोलें।
इसके बाद पीपल वृक्ष के आस-पास वस्त्र या सूत लपेट कर परिक्रमा करें। परिक्रमा के समय भी भगवान विष्णु का ध्यान जरूर करते रहें। यथाशक्ति मिठाई का भोग लगाएं। घी या तिल के तेल का दीप जलाकर शिव, विष्णु या त्रिदेव की आरती करें। अंत में शनि पीड़ा दूर करने और अपने दोषों के लिए क्षमा प्रार्थना करें। पीपल वृक्ष की मात्र परिक्रमा से ही शनि पीड़ा का अंत हो जाता है।
शनि के इस खास मंत्र और सामान्य पूजा विधि :
शनिवार के दिन सुबह स्नान कर घर या नवग्रह मंदिर में शनिदेव की गंध, अक्षत, काले तिल, उड़द और तिल का तेल चढ़ाकर पूजा करें। पूजा के बाद शनि के इस वैदिक मंत्र का जप कम से कम 108 बारे जरूर करें -
ऊँ शन्नो देवीरभीष्टय, आपो भवन्तु पीतये। शं योरभिस्त्रवन्तु न:।।
मंत्र जप के बाद शनिदेव से पूजा या मंत्र जप में हुई गलती के लिए क्षमा मांग स्वयं या परिजन की बीमारी से मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। हिन्दू धर्म में प्रकृति को भी देव रूप मानता है। जिससे कोई भी इंसान चाहे वह धर्म को मानने वाला हो या धर्म विरोधी सीधे ही किसी न किसी रूप में प्रकृति और प्राणियों से प्रेम के द्वारा जुड़कर धर्म पालन कर ही लेता है। कुदरत की देव रूप उपासना का ही अंग हे पीपल पूजा। पीपल को अश्वत्थ भी कहा जाता है। शास्त्रों के मुताबिक पीपल देववृक्ष होकर इसमें त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। ब्रह्मा का स्थान जड़ में, विष्णु का मध्य भाग या तने और अगले भाग यानि शाखाओं में शिव का स्थान है। इस वृक्ष की टहनियों में त्रिदेव सहित इंद्र और गो, ब्राह्मण, यज्ञ, नदी और समुद्र देव वास भी माना जाता है। इसलिए यह वृक्ष पंचदेव, ऊंकार या कल्पवृक्ष के नाम से भी पूजित है।
पीपल वृक्ष की पूजा से सांसारिक जीवन के अनेक कष्टों का दूर करती है। यहां हम ग्रहदोष खासतौर पर शनि पीड़ा का अंत करने के लिए पीपल पूजा की सरल विधि जानते हैं -
स्नान कर सफेद वस्त्र पहन पीपल के व़ृक्ष के नीचे की जमीन गंगाजल से पवित्र करें। दु:खों को दूर करने के मानसिक संकल्प के साथ स्वस्तिक बनाकर पीपल में सात बार जल चढ़ाएं। सामान्य पूजा सामग्रियों कुंकुम, अक्षत, फूल चढ़ाकर भगवान विष्णु, लक्ष्मी, त्रिदेव, शिव-पार्वती का ध्यान करें। इन देवताओं के सरल मंत्रों का बोलें।
इसके बाद पीपल वृक्ष के आस-पास वस्त्र या सूत लपेट कर परिक्रमा करें। परिक्रमा के समय भी भगवान विष्णु का ध्यान जरूर करते रहें। यथाशक्ति मिठाई का भोग लगाएं। घी या तिल के तेल का दीप जलाकर शिव, विष्णु या त्रिदेव की आरती करें। अंत में शनि पीड़ा दूर करने और अपने दोषों के लिए क्षमा प्रार्थना करें। पीपल वृक्ष की मात्र परिक्रमा से ही शनि पीड़ा का अंत हो जाता है।
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